शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

मालवी ;गीत ; सायब जी सारु रोटी ली के जव रे सहेलिया


राजेश भंडारी "बाबु"
सायब जी सारु रोटी ली के जव रे सहेलिया

 








                                    


सायब जी सारु रोटी ली के जव रे सहेलिया ,
ऑटो मस्ल्यो दूध में ने फुल्का बनाया ,
लसन वाली चटनी में  लूँन् मिलाया ,
छोटी डली गोल की ने पापड़ सेकाया ,
हो जैसे सबरी ने रामजि को बेर खिलया
सायब जी सारु रोटी ली के जव रे सहेलिया ,
माथा ऊपर टोपली सरकी सरकी जावे ,
ऊपर उठाव हाथ तो कमर नजर आवे ,
छेडो काडू मुंडा पे बाट णी पावे  
चुनर खोसू काछ्डा में घणी लाज आवे ,
नीची चुनर राखु तो खल्डई जावे
सावन का सेरा मुवा घडी घडी आवे ,
माग का सिंदूर का रेला निचे आवे
गीली हुई काच्ली ने चिपकी चिपकी जावे
भीगी हुई चुनर भी  लपटई जावे
गोया गोए जव तो कीचड़ लागे ,
सेडे-सेडे जव तो कांटा हो भागे ,
हल घेरता भवर जी  घना प्यारा लागे ,
कने उनका जावू तो वि दूर दूर भागे ,
सावन का मोसम में भी गर्मी लागे
लाल हुरया गाल ने ,दिल घनो भागे
आज झड़ी पडे तो भाग म्हरा जागे
सासू जी का प्यार जाया ,नंनदी का बीरा,
देवर जी का दादा ई ने ससरा जी का प्यारा
जेठजी का लाडला, ने जेठानी का हिरा
जोग जनम हमने सायब ऐसा पाया ,
 जैसे राधा ने पाया हे किसन् कन्हया |
सायब जी सारु रोटी ली के जव रे सहेलिया



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